सड़कों पर चलने वाली कारों, बसों और बाइकों के टायरों पर रबर और गहरे खांचे (Treads) बने होते हैं ताकि सड़क पर मजबूत ग्रिप बनी रहे। इसके विपरीत, हजारों टन भारी मालगाड़ी या 160 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ती वंदे भारत एक्सप्रेस के पहिए भी चिकने लोहे (Solid Steel) के होते हैं और जिस पटरी (Rail Track) पर वे दौड़ते हैं, वह भी चिकने स्टील की होती है। तो फिर सवाल उठता है कि धातु पर धातु होने के बावजूद ट्रेन फिसलती (Slip) क्यों नहीं है?

1. भारी वजन और उच्च स्थैतिक घर्षण (Static Friction)

भौतिकी का नियम कहता है कि घर्षण बल (Frictional Force) दो सतहों के बीच लगने वाले लंबवत भार (Normal Load) के समानुपाती होता है। एक लोकोमोटिव इंजन का वजन 120 से 130 टन होता है। जब यह भारी-भरकम वजन पहियों के उस नन्हे से बिंदु (कॉन्टैक्ट पैच) पर पड़ता है जो पटरी को छू रहा होता है, तो वहां प्रति वर्ग सेंटीमीटर कई हजार किलोग्राम का अत्यधिक दबाव (Immense Pressure) उत्पन्न होता है। इस प्रचंड दबाव के कारण स्टील के पहिए और स्टील की पटरी के बीच आणविक स्तर पर एक बेहद मजबूत 'स्टैटिक फ्रिक्शन' बन जाता है।

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2. पहिया सपाट नहीं, शंक्वाकार (Conical) होता है

ट्रेन के पहियों की सबसे बड़ी इंजीनियरिंग विशेषता यह है कि वे बेलनाकार (Cylindrical / Flat) नहीं होते, बल्कि अंदर की तरफ थोड़े मोटे और बाहर की तरफ पतले—अर्थात शंक्वाकार (Conical Shape) होते हैं।

  • जब ट्रेन किसी मोड़ (Curve) पर मुड़ती है, तो बाहरी पहिये को अंदरूनी पहिये की तुलना में लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
  • कारों में इसके लिए जटिल 'डिफरेंशियल गियर' होता है, लेकिन ट्रेन के पहिए एक ठोस धुरे (Solid Axle) से जुड़े होते हैं।
  • शंक्वाकार बनावट के कारण मोड़ पर ट्रेन का बाहरी पहिया अपने बड़े व्यास (Larger Diameter) वाले हिस्से पर चढ़ जाता है और अंदरूनी पहिया छोटे व्यास पर आ जाता है। इससे दोनों पहिए बिना किसी फिसलन के स्वतः मोड़ पार कर लेते हैं। इसे रेलवे में 'कोनिसिटी' (Conicity) कहा जाता है।

3. चढ़ाई और बारिश में सैंड बॉक्स (Sanding System)

जब तेज बारिश या तेल के कारण पटरी बहुत अधिक चिकनी हो जाती है, तो इंजन के पहियों के ठीक आगे लगे 'सैंड बॉक्स' से संपीड़ित हवा (Compressed Air) के माध्यम से सूखी सिलिका रेत (Sand) पटरी पर छिड़की जाती है। यह रेत तुरंत पहिए और पटरी के बीच घर्षण को तीन गुना बढ़ा देती है और ट्रेन बिना फिसले भारी ढलान भी चढ़ जाती है।