कपड़े धोते समय, बर्तन साफ करते समय या स्विमिंग पूल में नहाते समय हम सभी ने देखा होगा कि लगभग 15 से 20 मिनट के भीतर हमारे हाथों और पैरों की उंगलियों की त्वचा अजीब तरह से सिकुड़ जाती है और उस पर गहरी सिलवटें (Wrinkles) पड़ जाती हैं। सूखी हवा में आने के कुछ ही देर बाद त्वचा दोबारा बिल्कुल सामान्य और चिकनी हो जाती है।
दशकों तक डॉक्टरों का मानना था कि त्वचा की सबसे बाहरी परत (Stratum Corneum) ऑस्मोसिस (Osmosis) के जरिए पानी सोखकर फूल जाती है, जिससे सिलवटें पड़ती हैं। लेकिन हालिया न्यूरोसाइंस अध्ययनों ने इस पुराने सिद्धांत को पूरी तरह खारिज कर दिया है। जानिए असली वैज्ञानिक सच:
1. नसों के कटने पर नहीं पड़तीं सिलवटें!
1930 के दशक में डॉक्टरों ने देखा कि जिन मरीजों की उंगलियों की तंत्रिकाएं (Median Nerve) किसी दुर्घटना में कट चुकी थीं, उनके हाथ घंटों पानी में रहने के बाद भी कभी नहीं सिकुड़े! यदि यह सिर्फ पानी सोखने का भौतिक नियम होता, तो कटी हुई नस वाले हाथ में भी सिलवटें पड़नी चाहिए थीं। इससे साबित हुआ कि उंगलियों का सिकुड़ना कोई निष्क्रिय प्रक्रिया नहीं, बल्कि मस्तिष्क और स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic Nervous System) द्वारा संचालित एक सक्रिय प्रतिक्रिया है।
2. रक्त वाहिकाओं का सिकुड़ना (Vasoconstriction)
जब हाथ लंबे समय तक पानी में रहते हैं, तो तंत्रिका तंत्र उंगलियों के पोरों में मौजूद सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) को सिकुड़ने का आदेश देता है। जैसे ही रक्त वाहिकाएं सिकुड़ती हैं, उंगलियों के नीचे का ऊतक आयतन (Tissue Volume) घट जाता है। ऊपर की त्वचा नीचे की ओर खिंचती है और खांचे (Channels / Grooves) बन जाते हैं।
3. कार के टायर जैसा 'वेट-ग्रिप' ड्रेनेज सिस्टम
न्यूकैसल विश्वविद्यालय (Newcastle University) के शोधकर्ताओं ने पाया कि उंगलियों पर बनने वाली ये सिलवटें बारिश में कार के टायरों पर बने खांचों (Tire Treads) की तरह काम करती हैं। जब हम पानी में किसी गीली चीज को पकड़ते हैं, तो ये खांचे पानी को तेजी से बाहर निकाल देते हैं, जिससे उंगलियों और वस्तु के बीच 100% संपर्क बन जाता है और पकड़ (Grip) कई गुना मजबूत हो जाती है। यह हमारे शिकारी-संग्राहक पूर्वजों को गीली चट्टानों पर फिसलने से बचाने और पानी में मछलियां पकड़ने के लिए कुदरत का दिया हुआ एक शानदार विकासवादी वरदान है।