नई दिल्ली: इतिहास के पन्नों में कुछ पल ऐसे दर्ज होते हैं जो किसी राष्ट्र की आत्मा पर गहरे घाव छोड़ते हैं। एक ऐसा दौर भी था जब अंतरराष्ट्रीय मंचों, पश्चिमी मीडिया और दुनिया के तथाकथित 'विकसित और संभ्रांत' देशों के ड्राइंग रूम्स में भारत का खुलेआम मज़ाक उड़ाया जाता था। कभी हमारे सपेरों और साधुओं के देश होने का उपहास बना, कभी हमारी भुखमरी और गरीबी को पश्चिमी कैमरों की नुमाइश बनाया गया, तो कभी हमारे वैज्ञानिकों के सपनों को 'दकियानूसी खयाली पुलाव' कहकर ठहाके लगाए गए।
लेकिन अगर इतिहास के उस सबसे तीखे, सबसे अपमानजनक और वैश्विक स्तर पर चर्चित पल की बात करें जब पूरी दुनिया की नज़रें भारत पर उपहास भरी थीं, तो वह घटना थी—2014 में न्यूयॉर्क टाइम्स (The New York Times) द्वारा छापा गया वह कुख्यात कार्टून और उसके पीछे की पश्चिमी मानसिकता।
1. न्यूयॉर्क टाइम्स का वह कार्टून: जब भारत की वैज्ञानिक मेधा का उपहास उड़ाया गया
साल 2014 था। भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने वह कारनामा कर दिखाया था जो दुनिया की कोई महाशक्ति अपने पहले प्रयास में नहीं कर पाई थी। भारत का मंगलयान (Mars Orbiter Mission - MOM) अपने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हो चुका था। जहाँ अमेरिका, सोवियत संघ और यूरोपीय स्पेस एजेंसी अपने शुरुआती दर्जनों प्रयासों में नाकाम रहे थे, वहीं भारत ने इतिहास रच दिया था।
लेकिन पश्चिमी दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले अमेरिकी अखबार 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' को भारत की यह कामयाबी हज़म नहीं हुई। अखबार के कार्टूनिस्ट हेंग किम सोंग ने 28 सितंबर 2014 को एक नस्लभेदी और अपमानजनक कार्टून छापा:
कार्टून का घृणित दृश्य:
एक आलीशान कांच का कमरा दिखाया गया जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था—"Elite Space Club" (विशेषाधिकार प्राप्त अंतरिक्ष क्लब)। अंदर पश्चिमी देशों के सूट-बूट और टाई पहने चश्मा लगाए वैज्ञानिक बैठे थे और अखबार में भारत के मंगल मिशन की खबर पढ़ रहे थे। बाहर दरवाजे पर एक पगड़ी और धोती पहने, दाढ़ी वाला दुबला-पतला भारतीय अपनी गाय की रस्सी पकड़े खड़ा था और क्लब का दरवाजा खटखटा रहा था।
इस कार्टून का सीधा संदेश यह था कि अंतरिक्ष विज्ञान केवल गोरी चमड़ी वाले अमीर देशों की जागीर है, और गाय चराने वाला 'सपेरों का भारत' इस क्लब में घुसने की औकात नहीं रखता। पूरी पश्चिमी दुनिया में इस कार्टून को चटकारे लेकर शेयर किया गया और बहस छिड़ी कि "जिस देश में करोड़ों लोग खुले में शौच करते हैं, वह मंगल पर रॉकेट भेजने का नाटक क्यों कर रहा है?"
भारत का वह जवाब जिसने दुनिया का मुंह बंद कर दिया:
- हॉलीवुड फिल्म से भी सस्ता मिशन: अमेरिका के नासा ने अपने 'मावेन' (MAVEN) मार्स मिशन पर करीब $671 मिलियन (लगभग ₹4,500 करोड़) खर्च किए थे, जबकि भारत के वैज्ञानिकों ने मंगलयान को मात्र $74 मिलियन (लगभग ₹450 करोड़) में मंगल पर पहुंचा दिया था। यह हॉलीवुड की स्पेस फिल्म Gravity ($100 मिलियन) के बजट से भी कम था!
- माफी मांगने पर मजबूर हुआ न्यूयॉर्क टाइम्स: दुनिया भर में हुए भारी विरोध और भारत की बेजोड़ तकनीकी दक्षता के आगे न्यूयॉर्क टाइम्स को झुकना पड़ा और अखबार के विदेशी संपादक एंड्रयू रोसेन्थल को आधिकारिक बयान जारी कर सार्वजनिक रूप से भारत से माफी मांगनी पड़ी।
- इतिहास का न्याय (2023): नौ साल बाद, 23 अगस्त 2023 को उसी भारत ने चंद्रमा के दुर्गम दक्षिणी ध्रुव (Lunar South Pole) पर चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग कराकर वह इतिहास रचा जो आज तक अमेरिका, रूस या चीन भी नहीं कर पाए हैं। आज वही पश्चिमी देश अपने सैटेलाइट लॉन्च कराने के लिए इसरो के दरवाजे पर कतार लगाकर खड़े हैं।
2. 1963: थुम्बा का चर्च, साइकिल पर रॉकेट और पश्चिमी मीडिया के ठहाके
मज़ाक उड़ाने का यह सिलसिला 2014 में शुरू नहीं हुआ था। इसकी जड़ें 1960 के दशक में थीं। 21 नवंबर 1963 को जब केरल के एक छोटे से मछुआरों के गांव थुम्बा (Thumba) में भारत के पहले साउंडिंग रॉकेट (Nike-Apache) का प्रक्षेपण होना था, तो भारत के पास न तो आधुनिक लॉन्च पैड थे और न क्रेन।
डॉ. विक्रम साराभाई और एक युवा वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने बिशप के चर्च को कंट्रोल रूम बनाया था। रॉकेट के नोज-कोन और संवेदनशील उपकरणों को साइकिल के कैरियर पर बांधकर लॉन्च पैड तक ले जाया गया था। इतना ही नहीं, 1981 में जब भारत का पहला स्वदेशी प्रायोगिक संचार उपग्रह APPLE (Ariane Passenger Payload Experiment) तैयार हुआ, तो एंटीना परीक्षण के लिए उसे लकड़ी की बैलगाड़ी पर ले जाया गया था क्योंकि बैलगाड़ी में कोई धातु (Metal) नहीं होती थी जो रेडियो फ्रिक्वेंसी में बाधा डाले।
उस समय ब्रिटिश और अमेरिकी अखबारों ने तस्वीरें छापकर व्यंग्य कसा था: "भूखे-नंगे भारतीयों का अंतरिक्ष तमाशा... बैलगाड़ी पर उपग्रह लादने वाले अब नासा की बराबरी करेंगे!" उस समय दुनिया हंस रही थी, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों की आंखों में वह संकल्प था जिसने आगे चलकर एक ही रॉकेट से 104 उपग्रह एक साथ अंतरिक्ष में दागकर विश्व रिकॉर्ड बनाया।
3. 1947: विंस्टन चर्चिल की वह हिकारत भरी भविष्यवाणी
जब 1947 में भारत की आज़ादी की बात चल रही थी, तो ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे बड़े पैरोकार और पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने ब्रिटिश संसद में खड़े होकर भारत का घोर अपमान किया था। चर्चिल ने कहा था:
"भारत कोई राष्ट्र नहीं है, यह केवल एक भौगोलिक अभिव्यक्ति है जैसे विषुवत् रेखा (Equator)... सत्ता उन बदमाशों, ठगों और लफंगों के हाथ में चली जाएगी जिनका कोई स्तर नहीं होगा। ये नेता तिनके के बने लोग होंगे। भारत कुछ ही वर्षों में आपसी मजहबी दंगों, अकाल और भुखमरी में तबाह हो जाएगा और अपनी आज़ादी गंवा बैठेगा।"दुनिया मानती थी कि सैकड़ों रियासतों, दर्जनों भाषाओं और जातियों में बंटा यह गरीब देश 5 साल भी लोकतंत्र के रूप में टिक नहीं पाएगा। लेकिन 75 से अधिक वर्षों बाद हकीकत क्या है?
- चर्चिल का अपना देश ब्रिटेन आज राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहा है, जबकि उसी भारत ने ब्रिटेन को पछाड़कर दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का मुकाम हासिल किया।
- जिस देश को शासन चलाने के नाकाबिल बताया गया था, उसी भारतीय मूल के राजनेता (ऋषि सुनक) ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनकर 10 डाउनिंग स्ट्रीट में बैठे।
4. 1998: पोखरण परमाणु परीक्षण और सीआईए की नाकामी की खीझ
मई 1998 में जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में भारत ने राजस्थान के पोखरण में 'ऑपरेशन शक्ति' के तहत 5 गुप्त परमाणु परीक्षण किए, तो पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई। अमेरिकी जासूसी उपग्रह (CIA Satellites) चौबीसों घंटे भारत पर नज़र रख रहे थे, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने सेना की वर्दी पहनकर और उपग्रहों के ब्लाइंड स्पॉट का फायदा उठाकर खुफिया तंत्र की धज्जियां उड़ा दीं।
परीक्षण के बाद अमेरिका, जापान, जर्मनी और पश्चिमी देशों ने भारत पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध थोप दिए। अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में लिखा गया कि "भारत की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था अब वेंटिलेटर पर चली जाएगी और भारत घुटनों के बल भीख मांगने आएगा।" लेकिन भारत झुका नहीं। देशवासियों और प्रवासी भारतीयों ने मिलकर देश को संभाला, प्रतिबंध औंधे मुंह गिरे और कुछ ही वर्षों में अमेरिका को भारत के साथ ऐतिहासिक सिविल न्यूक्लियर डील पर हस्ताक्षर करने पड़े।
5. 2020: कोरोना महामारी और 'लाशों के ढेर' की पश्चिमी भविष्यवाणियां
जब 2020 में कोविड-19 महामारी फैली, तो पश्चिमी थिंक-टैंकों और मीडिया ने भारत के बारे में अत्यंत भयावह और अपमानजनक भविष्यवाणियां कीं। कहा गया कि 140 करोड़ की आबादी वाला यह देश महामारी को संभाल नहीं पाएगा और सड़कों पर लाशों के ढेर लग जाएंगे। पश्चिमी मीडिया ने भारत के दाह-संस्कारों की ड्रोन तस्वीरें बेचकर लाखों डॉलर कमाए।
लेकिन भारत ने क्या किया?
- भारत ने न केवल स्वदेशी वैक्सीन (Covaxin व Covishield) रिकॉर्ड समय में विकसित की, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म CoWIN के जरिए 220 करोड़ से अधिक टीकों का पारदर्शी रिकॉर्ड बनाया।
- जहाँ अमेरिका और यूरोप में लोग हाथ से लिखे कागजी वैक्सीन कार्ड लेकर घूम रहे थे, वहीं भारत के सुदूर गांव के नागरिक के मोबाइल में एक मिनट में क्यूआर-कोड वाला डिजिटल सर्टिफिकेट उपलब्ध था।
- इतना ही नहीं, भारत ने 'वैक्सीन मैत्री' अभियान चलाकर दुनिया के 100 से अधिक गरीब और विकासशील देशों को करोड़ों मुफ्त टीके भेजकर मानवता की रक्षा की।
जिस देश को कभी 'सपेरों का देश' कहा गया, आज वह दुनिया के सबसे बड़े टेक दिग्गजों (Google, Microsoft, Adobe, IBM) को सीईओ दे रहा है। जिस देश की साइकिल और बैलगाड़ी पर दुनिया हंसी थी, आज वह दुनिया के 46% रियल-टाइम डिजिटल ट्रांजैक्शन (UPI) अकेले संभाल रहा है। दुनिया का वह मज़ाक भारत की कमजोरी नहीं बना, बल्कि वह अग्नि परीक्षा साबित हुआ जिसने 140 करोड़ भारतीयों के भीतर सोए हुए आत्मसम्मान और 'आत्मनिर्भर भारत' की ज्वाला को प्रज्वलित कर दिया।