भारतीय वायुसेना (आईएएफ) इस समय अपने इतिहास के सबसे संवेदनशील रणनीतिक मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ सीमा पार चीन अपनी पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमानों (J-20) की खेप लगातार बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय वायुसेना की अधिकृत स्क्वाड्रन संख्या 42 से घटकर महज़ 30 के आसपास सिमट गई है। इस खालीपन के बीच रूस ने भारत को अपने सबसे आधुनिक पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर सुखोई Su-57 (Su-57 Felon) की आपूर्ति, तकनीक हस्तांतरण और संयुक्त उत्पादन का एक आकर्षक प्रस्ताव फिर से पेश किया है।
दूसरी ओर, भारत के स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम 'एम्का' (AMCA - Advanced Medium Combat Aircraft) को लेकर बेंगलुरु में उच्च स्तरीय समीक्षा बैठकें चल रही हैं। हाल ही में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) नियमित तकनीकी आधारों पर एम्का प्रोटोटाइप निर्माण की होड़ से बाहर हो गई है और अब तीन निजी कंसोर्टियम इस दौड़ में हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत को अपनी तात्कालिक सुरक्षा जरूरतों के लिए रूसी Su-57 को अपनाना चाहिए, या फिर पूर्ण रूप से स्वदेशी एम्का पर ही दांव लगाना चाहिए?
रोज़मर्रा की ज़िंदगी से उदाहरण: कल्पना कीजिए कि अंधेरी रात में कोई व्यक्ति टॉर्च जलाकर किसी चीज़ को ढूंढ रहा है। अगर सामने एक सपाट शीशा या धातु की चादर रखी हो, तो टॉर्च की रोशनी सीधे टकराकर वापस उस व्यक्ति की आंखों में चमकेगी और वह वस्तु फौरन पकड़ में आ जाएगी। यह सामान्य चौथी पीढ़ी के विमानों (जैसे सुखोई-30MKI या मिराज) के साथ होता है, जिनका आकार रडार की किरणों को सीधा दुश्मन के रिसीवर तक वापस भेज देता है।
अब सोचिए कि उसी अंधेरे कमरे में किसी ने काले मखमली कपड़े पहने हों और उसके शरीर पर कई अजीब कोणों (angles) वाले पतले पैनल लगे हों। टॉर्च की रोशनी या तो उस कपड़े में जज़्ब हो जाएगी या फिर किसी दूसरे कोने में मुड़ जाएगी, जिससे टॉर्च जलाने वाले को कुछ दिखाई नहीं देगा। पांचवीं पीढ़ी के 'स्टील्थ' विमान ठीक यही करते हैं। इनके बाहरी ढांचे का घुमावदार व कोणीय डिज़ाइन और इन पर चढ़ाई गई रडार-शोषक कोटिंग (RAM) दुश्मन के रडार को भ्रमित कर देती है। रडार स्क्रीन पर यह विशाल लड़ाकू विमान किसी बड़ी चिड़िया या धातु के छोटे सिक्के जैसा दिखता है, जिससे इसे समय रहते मार गिराना बेहद मुश्किल हो जाता है।
रूसी Su-57 का नया प्रस्ताव: मॉस्को की पेशकश में इस बार क्या खास है?रूस लंबे समय से भारत को Su-57 बेचने की कोशिश कर रहा है, लेकिन हालिया महीनों में मॉस्को ने अपने प्रस्ताव को पहले से कहीं अधिक उदार और लचीला बना दिया है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, रूस ने भारत को निम्नलिखित प्रमुख रियायतें देने की पेशकश की है:
- पूर्ण तकनीक हस्तांतरण (Full ToT): रूस केवल तैयार विमान बेचने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह भारत में ही इसके स्थानीय असेंबली और कल-पुर्जे बनाने की पूरी तकनीक देने को तैयार है।
- सॉफ्टवेयर सोर्स कोड तक पहुंच: पहले विदेशी सौदों में सबसे बड़ा गतिरोध यह होता था कि विदेशी कंपनियां विमान का 'दिमाग' यानी सोर्स कोड साझा नहीं करती थीं। रूस का दावा है कि वह भारत को अपने स्वदेशी हथियार और एवियोनिक्स जोड़ने के लिए पूर्ण सॉफ्टवेयर स्वतंत्रता देगा।
- घरेलू उदाहरण से समझें: यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई मोबाइल कंपनी आपको न केवल फोन बेचे, बल्कि उसके ऑपरेटिंग सिस्टम की पूरी प्रोग्रामिंग फाइलें भी सौंप दे, ताकि आप अपनी मर्जी से कोई भी ऐप चला सकें और फोन को अपने हिसाब से अपग्रेड कर सकें।
- युद्ध-परीक्षित अनुभव: रूस का तर्क है कि Su-57 को यूक्रेन युद्ध में वास्तविक युद्धक परिस्थितियों में आजमाया जा चुका है, जहां इसने लंबी दूरी की मिसाइलों से सटीक हमले किए हैं।
भारतीय वायुसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती समय की कमी है। वायुसेना को दो मोर्चों (चीन और पाकिस्तान) पर एक साथ मुकाबला करने के लिए कम से कम 42 लड़ाकू स्क्वाड्रन की आवश्यकता स्वीकृत की गई है। हालांकि, सोवियत दौर के पुराने मिग-21, मिग-27 और जगुआर विमानों के चरणबद्ध रिटायरमेंट के बाद यह संख्या घटकर लगभग 30 स्क्वाड्रन रह गई है।
सीमा के उस पार तस्वीर बिल्कुल अलग है। चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास तिब्बत और शिनजियांग के होटन और काशगर एयरबेस पर अपने चेंगदू J-20 स्टील्थ लड़ाकू विमान तैनात कर दिए हैं। इसके अलावा चीन अपने दूसरे स्टील्थ विमान J-35 का परीक्षण तेजी से कर रहा है, जिसे पाकिस्तान को भी बेचे जाने की खबरें हैं।
हाल ही में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने साफ शब्दों में चेतावनी दी थी कि स्वदेशी एम्का कार्यक्रम में किसी भी बड़ी देरी की स्थिति में वायुसेना को अपनी लड़ाकू क्षमता में आए अंतर को पाटने के लिए विदेशी विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है। यह बयान इस बात का संकेत है कि वायुसेना केवल वादों के सहारे अपनी सुरक्षा को अधर में नहीं छोड़ सकती।
एम्का प्रोजेक्ट में बड़ा मोड़: एचएएल बाहर, निजी क्षेत्र को मिली कमानभारत के स्वदेशी स्टील्थ फाइटर 'एम्का' (AMCA) के निर्माण को लेकर हाल ही में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। नई दिल्ली में आयोजित रक्षा सम्मेलन में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने पुष्टि की कि सरकारी एयरोस्पेस कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) नियमित तकनीकी आधारों पर एम्का के पांच प्रोटोटाइप बनाने की बोली से बाहर हो गई है।
रक्षा मंत्रालय के इस कदम के पीछे एक सोची-समझी औद्योगिक रणनीति है। रक्षा सचिव के शब्दों में, सरकार देश में सैन्य विमान निर्माण के लिए एक दूसरा समानांतर इकोसिस्टम तैयार करना चाहती है ताकि एक ही सरकारी संस्था पर सारी निर्भरता न रहे।
आसान शब्दों में समझें: इसे 'सारे अंडे एक ही टोकरी में न रखने' की नीति कहा जा सकता है। जैसे किसी शहर में पुल और सड़कों के निर्माण का ठेका केवल एक पुरानी सरकारी निर्माण एजेंसी को देने के बजाय सक्षम निजी बिल्डरों को भी शामिल किया जाए, ताकि काम समय पर पूरा हो और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बने।
वर्तमान में एम्का प्रोटोटाइप निर्माण की दौड़ में तीन बड़े निजी समूह शामिल हैं:
- टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL): जो स्वतंत्र रूप से बोली लगा रही है।
- एलएंडटी (L&T) कंसोर्टियम: जिसमें भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और डायनामैटिक टेक्नोलॉजीज शामिल हैं।
- भारत फोर्ज कंसोर्टियम: जिसमें बीईएमएल (BEML) और डेटा पैटर्न्स शामिल हैं।
एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) के पास विमान के मूल डिज़ाइन का नियंत्रण रहेगा, जबकि चयनित निजी भागीदार 5 उड़ने वाले प्रोटोटाइप और 1 स्ट्रक्चरल टेस्ट एयरक्राफ्ट तैयार करेगा। योजना के अनुसार, एम्का की पहली उड़ान का लक्ष्य सितंबर 2028 रखा गया है, लेकिन इसके पूर्ण उत्पादन और वायुसेना में शामिल होने में 2034-2035 तक का समय लग सकता है।
2018 में FGFA से क्यों पीछे हटा था भारत? पुरानी सीख और कड़वे अनुभवयह पहला मौका नहीं है जब Su-57 को लेकर भारत और रूस के बीच बातचीत हो रही है। साल 2007 में भारत और रूस ने Su-57 पर आधारित पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (FGFA/पर्सपेक्टिव मल्टी-रोल फाइटर) के संयुक्त विकास का समझौता किया था। भारत ने इसके प्रारंभिक डिज़ाइन चरण में लगभग 30 करोड़ डॉलर (करीब 2000 करोड़ रुपये) का निवेश भी किया था।
लेकिन 2018 में भारत इस परियोजना से पूरी तरह अलग हो गया। इसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
- अत्यधिक लागत: परियोजना को पूरा करने के लिए भारत से 8 से 9 अरब डॉलर की भारी भरकम मांग की जा रही थी।
- तकनीक में हिस्सेदारी की कमी: रूसी पक्ष महत्वपूर्ण तकनीकी आंकड़े और इंजन के कोर डिज़ाइन को भारतीय इंजीनियरों के साथ साझा करने में हिचकिचा रहा था।
- स्टील्थ मानकों पर संदेह: उस समय भारतीय विशेषज्ञों का मानना था कि Su-57 का रडार क्रॉस सेक्शन (RCS) अमेरिकी F-22 या F-35 जितना प्रभावी नहीं था। विशेषकर इसके पुराने AL-41F1 इंजन की बनावट रडार किरणों को पूरी तरह छिपा नहीं पाती थी।
हालांकि, अब रूस का दावा है कि उसने अपने नए 'इज़देलिये 30' (AL-51F1) इंजन और उन्नत कंपोजिट सामग्री के जरिए इन पुरानी कमियों को दूर कर लिया है।
Su-57 बनाम एम्का बनाम राफेल: रणनीतिक विकल्पों का विश्लेषणवर्तमान परिस्थितियों में भारत के रक्षा रणनीतिकारों के सामने तीन मुख्य रास्ते हैं, और तीनों के अपने फायदे और नुकसान हैं:
विकल्प 1: Su-57 को अंतरिम (Interim) विकल्प के रूप में खरीदना
यदि भारत रूस से दो या तीन स्क्वाड्रन (करीब 36 से 54 विमान) Su-57 खरीदता है, तो वायुसेना को अगले तीन से चार वर्षों में पांचवीं पीढ़ी की मारक क्षमता मिल जाएगी। इससे चीन के J-20 का मनोवैज्ञानिक और सामरिक दबाव तुरंत कम हो जाएगा। लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि अरबों डॉलर का रक्षा बजट रूस चला जाएगा, जिससे स्वदेशी एम्का कार्यक्रम के लिए वित्तीय संसाधन कम पड़ सकते हैं। इसके अतिरिक्त, रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पश्चिमी प्रतिबंधों (CAATSA) और रूसी कल-पुर्जों की समय पर आपूर्ति को लेकर भी जोखिम बना रहेगा।
विकल्प 2: राफेल की संख्या बढ़ाना और स्वदेशी एम्का पर पूरा जोर देना
भारत पहले से ही फ्रांस के 36 राफेल विमान उड़ा रहा है और भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल-एम की प्रक्रिया जारी है। इसके साथ ही वायुसेना के 114 मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) टेंडर में राफेल सबसे मजबूत दावेदार है। राफेल 4.5 पीढ़ी का बेहतरीन विमान है। यदि भारत राफेल की संख्या बढ़ाता है और अपनी सारी ऊर्जा व पूंजी एम्का को 2030 तक तैयार करने में लगाता है, तो यह 'आत्मनिर्भर भारत' के दृष्टिकोण से सबसे टिकाऊ फैसला होगा।
विकल्प 3: हाइब्रिड मॉडल - इंजन और तकनीक में विदेशी साझेदारी
तीसरा व्यावहारिक रास्ता यह हो सकता है कि भारत Su-57 का पूरा विमान खरीदने के बजाय एम्का के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण तकनीकों—जैसे 110 किलोन्यूटन थ्रस्ट वाला आधुनिक जेट इंजन—के लिए अमेरिका (GE F414 सौदे के तहत), फ्रांस (सफ्रान) या ब्रिटेन (रोल्स-रॉयस) के साथ संयुक्त उपक्रम को और तेज करे।
प्रमुख लड़ाकू विमानों की सीधी तुलना- सुखोई Su-57 (रूस): पांचवीं पीढ़ी का भारी स्टील्थ फाइटर, दो इंजन, अधिकतम गति मैक 2.0, आंतरिक हथियार बे (Internal Weapons Bay), सुपरक्रूज़ क्षमता मौजूद। वर्तमान स्थिति: रूसी वायुसेना में सक्रिय और युद्ध में इस्तेमाल।
- चेंगदू J-20 (चीन): पांचवीं पीढ़ी का भारी स्टील्थ फाइटर, दो इंजन, अधिकतम गति मैक 2.0+, लंबी दूरी की पीएल-15 मिसाइलों से लैस। वर्तमान स्थिति: 200 से अधिक विमान चीनी सेना में सक्रिय रूप से तैनात।
- एम्का - AMCA (भारत): पांचवीं पीढ़ी का मध्यम स्टील्थ फाइटर, दो इंजन, उन्नत एईएसए रडार, स्वदेशी अस्त्र मिसाइल प्रणाली और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित पायलट असिस्टेंस। वर्तमान स्थिति: डिज़ाइन पूरा, प्रोटोटाइप निर्माण के लिए निजी कंपनियां शॉर्टलिस्टेड, पहली उड़ान 2028 अनुमानित।
- राफेल (फ्रांस/भारत): 4.5 पीढ़ी का ओमनी-रोल फाइटर, दो इंजन, मेटियोर और स्कैल्प मिसाइलों से लैस, गैर-स्टील्थ लेकिन अत्यधिक प्रभावी इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (SPECTRA)। वर्तमान स्थिति: भारतीय वायुसेना की अग्रिम पंक्ति का मुख्य आधार।
हवाई युद्ध का सीधा नियम है कि आसमान में उड़ने वाला दूसरा सर्वश्रेष्ठ विमान कोई मायने नहीं रखता—जीत हमेशा उसी की होती है जिसके पास तकनीकी श्रेष्ठता हो। भारत अपने सबसे बड़े सुरक्षा साझेदार रूस के Su-57 प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज नहीं कर सकता, लेकिन 2018 के कड़वे अनुभवों को भूलकर आंख मूंदकर भरोसा करना भी बुद्धिमानी नहीं होगी।
भारत के लिए सबसे संतुलित और व्यावहारिक रास्ता यह होगा कि वह स्वदेशी एम्का कार्यक्रम को राष्ट्रीय मिशन (Mission Mode) घोषित करे और निजी क्षेत्र की भागीदारी के जरिए इसकी समयसीमा को किसी भी कीमत पर न फिसलने दे। साथ ही, जब तक एम्का पूरी तरह तैयार नहीं होता, तब तक वायुसेना की गिरती ताकत को संभालने के लिए तेजस एमके-1ए और राफेल जैसे आज़माए हुए 4.5 पीढ़ी के विमानों की तेज डिलीवरी सुनिश्चित की जाए। यदि चीन सीमा पर स्टील्थ असंतुलन बहुत अधिक गहराता है, तभी सीमित संख्या में किसी सिद्ध पांचवीं पीढ़ी के मंच पर 'स्टॉप-गैप' व्यवस्था के तहत विचार किया जाना चाहिए।