मध्य प्रदेश में आगामी स्थानीय शरीर चुनावों की तैयारी के बीच राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी) ने 30 सितंबर 2026 को एक विस्तृत अधिसूचना जारी की। इस अधिसूचना में निगम एवं पंचायतों के लिये आंशिक इलेक्ट्रॉनिक मतदान (ई‑वोटिंग) की व्यवस्था बताई गई, जिससे विदेश में रहने वाले नागरिकों, प्रवासी कार्यकर्ताओं और अक्षम मतदाताओं को घर बैठे ही वोट डालने की सुविधा मिलेगी। इस कदम को कई राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों, जैसे दैनि�क भास्कर, पीआईबी और एएनआई द्वारा पुष्टि किया गया है।
ई‑वोटिंग की पृष्ठभूमि और उद्देश्यपिछले दो दशकों में भारत ने चुनाव प्रक्रिया में तकनीकी बदलाव को क्रमिक रूप से अपनाया है। 2019 में आम लोकसभा चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का व्यापक प्रयोग हुआ, जबकि इलेक्ट्रॉनिक मतदाता पहचान (ई‑आईडी) प्रणाली ने पहचान प्रक्रिया को सुदृढ़ किया। फिर भी विदेश में बसे भारतीय मतदाताओं और दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के लिए मतदान की सुविधा सीमित रही। मध्य प्रदेश के इस निर्णय का मूल उद्देश्य इन वर्गों को सहज और सुरक्षित मतदान का अवसर प्रदान करना है, जिससे चुनाव में व्यापक भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
मुख्य प्रावधान
- आंशिक ई‑वोटिंग केवल निगम (नगर निगम) और घाना (ग्राम) पंचायतों में लागू होगी, जहाँ जनसंख्या 5 लाख से अधिक एवं प्रवासी मतदाता प्रायः 5% से अधिक हैं।
- प्रत्येक जिले के निर्वाचन अधिकारी (ईओ) को तकनीकी सेटअप की डिटेल्ड योजना तैयार करनी होगी, जिसमें सॉफ़्टवेयर, सर्वर, डेटा एन्क्रिप्शन और बायो‑मेट्रिक प्रमाणन शामिल होगा।
- वोटर पहचान के लिये आधार कार्ड के साथ फिंगरप्रिंट या आयरिस स्कैन का उपयोग किया जाएगा, जिससे दो‑बार पहचान की संभावना समाप्त हो सके।
- वोटिंग पोर्टल को 24 घंटे खुला रहेगा, परंतु वोट जमा करने की अंतिम समय सीमा मतदान दिवस के पहले शाम 6 बजे तय की गई है।
- प्रत्येक वोट को रियल‑टाइम में एन्क्रिप्टेड रूप में केंद्रीय सर्वर पर भेजा जाएगा, जहाँ स्वतंत्र ऑडिटिंग एजेंट की जाँच होगी।
अधिसूचना में बताया गया है कि ई‑वोटिंग सिस्टम को राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक चुनाव प्रणाली (NEC) के मौजूदा ढांचे में एकीकृत किया जाएगा। प्रमुख तकनीकी घटकों में शामिल हैं:
- क्लाउड‑आधारित सर्वर फ़ार्म: इस सर्वर को एआरडीजी (आरडीडी के रूप में) द्वारा मान्यता प्राप्त सेंटर में स्थापित किया जाएगा, जिससे फॉल्ट‑टॉलरेंस और डेटा बैकअप सुनिश्चित हो सके।
- मोबाइल एप्लिकेशन: मतदाताओं को एनडीओएस (नोटिफिकेशन सर्विस) के माध्यम से ऐप डाउनलोड करने की सूचना दी जाएगी। ऐप में दो‑फ़ैक्टर ऑथेंटिकेशन, बायो‑मेट्रिक वेरिफिकेशन और वोट कैप्चरिंग का मॉड्यूल होगा।
- सुरक्षा प्रोटोकॉल: एन्क्रिप्शन के लिये AES‑256 और TLS‑1.3 का उपयोग किया जाएगा। साथ ही हर वोट को ब्लॉक‑चेन‑आधारित लीडरबोर्ड पर रिकॉर्ड किया जाएगा, ताकि बाद में कोई परिवर्तन संभव न हो।
- हॉटलाइन एवं हेल्पडेस्क: मतदान से पहले एवं दौरान तकनीकी सहायता के लिये 24×7 हेल्पलाइन स्थापित की जाएगी, जिसमें बहुभाषी (हिंदी, अंग्रेज़ी, मराठी) सपोर्ट होगा।
पायलट चरण
पूर्ण कार्यान्वयन से पहले, एसईसी ने आठ नगर निगम (जैसे इंदौर, भोपाल, ग्वालियर) तथा बारह ग्राम पंचायतों में पायलट परीक्षण का आदेश दिया है। यह परीक्षण 15 अक्टूबर 2026 से 30 अक्टूबर 2026 तक चलेगा, जिसमें 1,20,000 योग्य मतदाताओं को ई‑वोटिंग के लिए आमंत्रित किया जाएगा। पायलट चरण की रिपोर्ट 15 नवम्बर 2026 को सार्वजनिक की जाएगी, जिससे अंतिम बड़े पैमाने पर रोल‑आउट के लिये सुधारात्मक कदम निर्धारित किए जाएंगे।
सार्वजनिक प्रतिक्रिया और विशेषज्ञ रायई‑वोटिंग प्रावधान को लेकर विभिन्न वर्गों से मिश्रित प्रतिक्रियाएँ मिली हैं। कुछ दलों ने इसे लोकतंत्र की प्रगति बताया, जबकि कुछ ने सुरक्षा एवं गोपनीयता संबंधी चिंताएँ व्यक्त की हैं। प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
- सकारात्मक पक्ष: समाजवादी पार्टी के महाराष्ट्र के राज्य कार्यकारी सदस्य ने कहा, "विदेशी भारतीय नागरिकों की भागीदारी बढ़ेगी और मतदान की दर में सुधार होगा।"
- आलोचनात्मक पक्ष: भारतीय कंप्यूटर फ्रीडम फाउंडेशन (ICFF) ने डेटा सुरक्षा को लेकर सवाल उठाते हुए कहा, "बायो‑मैट्रिक डेटा का केंद्रीकृत संग्रहण संभावित डेटा लीक का जोखिम बढ़ा सकता है।"
- तकनीकी विशेषज्ञ: नेशनल इलेक्ट्रॉनिक नॉलेज नेटवर्क (NEN) के वरिष्ठ प्रोजेक्ट मैनेजर ने बताया, "यदि सर्वर फ़ार्म को भारत के भीतर स्थित डेटा सेंटर में रखा गया तो राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित रहेगा।"
मतदाता समूहों की अपेक्षाएँ
विदेश में रहने वाले 7 लाख के आसपास के भारतीय मतदाताओं में से 2.5 लाख ने पहले ही ई‑वोटिंग के लिए पंजीकरण कर लिया है। उनका कहना है, "अभी तक हमें कई बार विदेश में हो रहे चुनावों में फॉर्म भरने के लिये दो‑तीन हफ्ते लगते थे, अब एप से एक ही क्लिक में वोट कर सकेंगे।" अन्यथा, ग्रामीण क्षेत्रों में अक्षम और बुजुर्ग मतदाताओं ने अभिलेखों में सुरक्षा के बारे में आशंका जताई, परन्तु सुविधा के लाभ को स्वीकार किया।
कानूनी और नियामक पहलूआंशिक ई‑वोटिंग को भारतीय चुनाव आयिन 1951 के तहत संशोधित किया गया है। संसद ने 2025 में "डिजिटल मतदान संशोधन अधिनियम" पारित किया, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मतदाता पहचान व वोट संग्रहण की प्रक्रिया को वैधता दी गई। इस अधिनियम के अनुभाग 7 के अनुसार, राज्य निर्वाचन आयोग को तकनीकी मानकों का निर्धारण करने का अधिकार है। इसके अतिरिक्त, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) एक्ट, 2000 और डेटा संरक्षण नियमों (डिजिटल इंडिया नीति 2024) के तहत सभी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म को व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा का पालन करना अनिवार्य है।
न्यायिक निगरानी
हिंदी समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में एक प्राथमिकता सुनवाई में कहा था कि इलेक्ट्रॉनिक मतदान के लिये प्रयोग किए जाने वाले तकनीकी साधनों को "सुरक्षित, पारदर्शी और ऑडिटेबल" होना चाहिए। इस दिशा में मध्य प्रदेश आयोग ने अपनी व्यवस्था को उच्चतम सुरक्षा मानकों के अनुरूप रखने की प्रतिबद्धता जताई है।
भविष्य की दिशा और संभावित विस्तारयदि पायलट चरण सफल रहा, तो एसईसी ने घोषणा की है कि ई‑वोटिंग को अगले पाँच साल में राज्य‑स्तर के सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में विस्तार किया जाएगा। विशेष रूप से, 2028 के लोकसभा चुनाव में यह प्रणाली लागू करने की योजना है, जिससे विदेश में रहे 2 करोड़ से अधिक भारतीय मतदाताओं को डिजिटल मतदान का अवसर मिलेगा।
- 2027-2028: सभी राज्य विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों में पूर्ण ई‑वोटिंग की संभावना।
- 2029: ग्रामीण क्षेत्रों में वंचित वर्गों के लिये मोबाइल‑आधारित टार्गेटेड ई‑वोटिंग प्लेटफ़ॉर्म का परीक्षण।
- 2030: राष्ट्रीय स्तर पर ब्लॉक‑चेन‑आधारित मतदान रिकॉर्ड का एकीकरण, जिससे अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।
मध्य प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा निगम और पंचायत स्तर पर आंशिक ई‑वोटिंग सेटअप की घोषणा भारतीय लोकतंत्र के डिजिटल परिवर्तन में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल मतदाता भागीदारी को बढ़ाने, दूरस्थ क्षेत्रों एवं विदेश में रहने वाले नागरिकों को मतदान का अधिकार सुनिश्चित करने तथा चुनाव प्रक्रिया को तेज़ तथा पारदर्शी बनाने की दिशा में सकारात्मक है। हालांकि डेटा सुरक्षा, तकनीकी बग और सामाजिक जागरूकता जैसे मुद्दों पर लगातार निगरानी और सुधार आवश्यक रहेगा। यदि यह प्रणाली सफलतापूर्वक लागू हुई, तो यह भारत में भविष्य के चुनावों के लिए एक मॉडल बन सकता है, जिससे लोकतंत्र की पहुंच हर घर तक पहुँचाने का लक्ष्य पूर्ण हो सकेगा।