नई दिल्ली में आयोजित प्रतिष्ठित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम के आठवें संस्करण के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक नीति-निर्माताओं और उद्योग जगत के दिग्गजों के सामने भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक मजबूती और भविष्य की प्राथमिकताओं को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया। प्रधानमंत्री ने वैश्विक मंच से दृढ़ता के साथ कहा कि भारत केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र ही नहीं, बल्कि 'लोकतंत्र की जननी' (Mother of Democracy) है। भारत की विविधता, संस्थागत मजबूती और जनभागीदारी का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि देश का विकास केवल अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत पूरी दुनिया के साथ और दुनिया की भलाई के लिए आगे बढ़ रहा है।
यह पहला अवसर है जब ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम का आयोजन भारत की धरती पर किया गया है। तीन दिवसीय इस उच्चस्तरीय सम्मेलन में दुनिया भर के 500 से अधिक शीर्ष प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं, जिनमें विभिन्न देशों के पूर्व और वर्तमान राष्ट्राध्यक्ष, केंद्रीय बैंकों के गवर्नर, फॉर्च्यून 100 कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं। इस वर्ष के फोरम का केंद्रीय विषय 'ए वर्ल्ड इन प्ले: डिफाइनिंग द न्यू लीवर्स ऑफ पावर' रखा गया है, जिसके केंद्र में बदलती भू-राजनीति, आपूर्ति श्रृंखला का पुनर्गठन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और वैश्विक पूंजी प्रवाह जैसे अहम विषय हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक निरंतरता का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में लोकतांत्रिक चेतना कोई आधुनिक आयात नहीं है, बल्कि यह देश के सामाजिक ताने-बाने और सामूहिक चेतना में सदियों से रची-बसी है। उन्होंने कहा कि जब दुनिया लोकतंत्र को केवल मतपेटी और चुनावी प्रक्रिया के नजरिए से देखती है, तब भारत इसे संवाद, सहमति और समावेशन की जीवनशैली के रूप में जीता है।
प्रधानमंत्री ने देश के विविधतापूर्ण समाज और मीडिया परिदृश्य के ठोस आंकड़े प्रस्तुत करते हुए भारत के खुलेपन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत में 100 से अधिक भाषाएं और बोलियां जीवंत हैं, लगभग 80,000 पंजीकृत समाचार पत्र और पत्रिकाएं नियमित रूप से प्रकाशित होती हैं, और 1,000 से अधिक सैटेलाइट टेलीविजन चैनल हर दिन जनसरोकारों पर निर्बाध बहस और संवाद का मंच उपलब्ध कराते हैं। यह संख्या साबित करती है कि भारतीय समाज में असहमति, विचार-विमर्श और स्वस्थ समालोचना के लिए कितना व्यापक स्थान उपलब्ध है।
आंकड़ों में भारतीय लोकतंत्र का विस्तार
- भाषाई संपन्नता: देश में 100 से अधिक प्रमुख भाषाएं और सैकड़ों बोलियां सक्रिय जनसंवाद का माध्यम हैं।
- प्रेस और प्रकाशन: 80,000 से अधिक पंजीकृत समाचार पत्र और पत्रिकाएं देश के हर कोने में सूचना का प्रसार करती हैं।
- टेलीविजन नेटवर्क: 1,000 से अधिक सैटेलाइट टीवी चैनल चौबीसों घंटे विभिन्न दृष्टिकोणों को जनता के समक्ष रखते हैं।
- डिजिटल भागीदारी: यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर 50-50 करोड़ से अधिक सक्रिय भारतीय उपभोक्ता स्वतंत्र रूप से अपने विचार साझा कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने पारंपरिक मीडिया के साथ-साथ भारत में तेजी से उभरे डिजिटल सार्वजनिक विमर्श का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आज के भारत में डिजिटल क्रांति ने गांव-देहात के अंतिम व्यक्ति तक को अपनी आवाज उठाने का सशक्त साधन उपलब्ध करा दिया है। अकेले यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 50-50 करोड़ से ज्यादा भारतीय सक्रिय हैं। वे केवल मूक दर्शक नहीं हैं, बल्कि नीतिगत निर्णयों, सामाजिक विषयों और राष्ट्रीय पहलों पर अपनी बेबाक राय दर्ज कराते हैं।
आसान शब्दों में समझें: डिजिटल लोकतंत्र और गांव की चौपाल
इसे समझने के लिए अपने गांव या कस्बे की पारंपरिक चौपाल की कल्पना कीजिए। पहले किसी भी सार्वजनिक फैसले के लिए गांव के लोग एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठते थे, जहां बुजुर्ग से लेकर युवा तक अपनी बात रखते थे और आपसी सहमति से फैसला होता था। भारत के आधुनिक लोकतंत्र ने उसी चौपाल को डिजिटल राजमार्ग में बदल दिया है। अब किसी नागरिक को अपनी बात राजधानी तक पहुंचाने के लिए किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं है; हाथ में मौजूद स्मार्टफोन ही उसकी आधुनिक चौपाल बन चुका है, जहां करोड़ों लोग एक साथ राष्ट्र-निर्माण के संवाद में भागीदार बन रहे हैं।
वैश्विक मंच पर शक्ति के बदलते स्वरूप की व्याख्या करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने एक मौलिक प्रशासनिक दर्शन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में सत्ता, पूंजी, डेटा और उन्नत तकनीक शक्ति के नए माध्यम बन चुके हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि इस शक्ति का उपयोग किस दिशा में किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि भारत की सोच 'पावर टू कंट्रोल' (नियंत्रण की शक्ति) में नहीं, बल्कि 'पावर टू एम्पॉवर' (सशक्त बनाने की शक्ति) में विश्वास करती है।
उन्होंने कहा कि जब सरकारों या संस्थाओं के हाथ में शक्ति आती है, तो उसका स्वाभाविक रुझान नागरिकों पर नियंत्रण कसने का हो सकता है। परंतु भारत का मॉडल इसके ठीक उलट है। यहां डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर और ओएनडीसी) का निर्माण इस उद्देश्य से किया गया है ताकि सत्ता का विकेंद्रीकरण हो और शक्ति सीधे आम नागरिक के हाथ में पहुंचे। तकनीक का इस्तेमाल किसी को बांधने के लिए नहीं, बल्कि उसके पंखों को उड़ान देने के लिए होना चाहिए।
वैश्विक अनिश्चितता के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरतावैश्विक अर्थव्यवस्था में छाई मंदी, भू-राजनीतिक तनावों और आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यवधानों के बीच प्रधानमंत्री ने भारत को एक स्थिर और विश्वसनीय विकास इंजन के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जब दुनिया भर के देश महंगाई और अनिश्चितता से जूझ रहे हैं, भारत निरंतर मजबूत आर्थिक वृद्धि दर बनाए हुए है।
प्रधानमंत्री ने भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती के प्रमुख संकेतकों को दुनिया के सामने रखा:
- विदेशी मुद्रा भंडार: भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर को पार कर चुका है, जो बाहरी आर्थिक झटकों से निपटने के लिए मजबूत ढाल प्रदान करता है।
- मजबूत बैंकिंग ढांचा: पिछले एक दशक में किए गए व्यवस्थित वित्तीय सुधारों और एनपीए सफाई अभियान के बाद भारत का बैंकिंग क्षेत्र आज दुनिया के सबसे लचीले और मुनाफे वाले तंत्रों में शुमार है।
- पूंजीगत व्यय (कैपेक्स): सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे—रेलवे, राजमार्ग, हवाई अड्डे, बंदरगाह और ऊर्जा ग्रिड—पर किए जा रहे रिकॉर्ड निवेश ने विनिर्माण और औद्योगिक गतिविधियों को नई गति दी है।
- विनिर्माण और नवाचार: पीएलआई (उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन) योजनाओं के दम पर भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, रक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक विनिर्माण का नया केंद्र बनकर उभर रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक निवेशकों और व्यापारिक नेताओं को आश्वस्त करते हुए कहा कि भारत की प्रगति किसी अन्य देश के नुकसान की कीमत पर नहीं है। भारत का आर्थिक उदय 'जीरो-सम गेम' नहीं है। उन्होंने कहा, 'भारत दुनिया के साथ और दुनिया के लिए आगे बढ़ रहा है।' चाहे वह कोरोना संकट के दौरान 150 से अधिक देशों को जीवनरक्षक दवाएं और टीके उपलब्ध कराना हो, या फिर ग्लोबल साउथ के देशों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रमुखता से उठाना—भारत ने हमेशा एक जिम्मेदार और भरोसेमंद साझेदार की भूमिका निभाई है।
उन्होंने सेमीकंडक्टर मिशन, हरित हाइड्रोजन (ग्रीन हाइड्रोजन), अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में भारत में बन रहे अनुकूल परिवेश की चर्चा की। प्रधानमंत्री ने वैश्विक कंपनियों को भारत में निवेश करने और भारतीय प्रतिभा के साथ साझेदारी कर वैश्विक समाधान तैयार करने का खुला निमंत्रण दिया।
आम नागरिक के जीवन पर इस अंतरराष्ट्रीय मंच का प्रभावअंतरराष्ट्रीय आर्थिक सम्मेलनों और वैश्विक बयानों का सीधा असर देश के आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। जब भारत जैसे विशाल देश को वैश्विक मंचों पर लोकतांत्रिक स्थिरता और आर्थिक विश्वसनीयता का प्रमाण पत्र मिलता है, तो इसके कई प्रत्यक्ष लाभ जमीन पर दिखाई देते हैं:
- रोजगार के नए अवसर: वैश्विक फॉर्च्यून 100 कंपनियों द्वारा भारत में संयंत्र लगाने और डेटा सेंटर स्थापित करने से लाखों कुशल और गैर-कुशल युवाओं को उच्च वेतन वाले रोजगार मिलते हैं।
- सस्ती और सुगम तकनीक: डिजिटल बुनियादी ढांचे के विस्तार से छोटे व्यापारियों, किसानों और महिलाओं को बिना बिचौलियों के सीधे बैंक खातों में सरकारी योजनाओं और ऋण की सुविधा मिलती है।
- मुद्रा की मजबूती और कम महंगाई: 700 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार भारतीय रुपये को अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल से बचाता है, जिससे आयातित वस्तुओं की कीमतें नियंत्रित रहती हैं और आम उपभोक्ता पर महंगाई का बोझ नहीं बढ़ता।
- ऐतिहासिक मेजबानी: भारत पहली बार दुनिया के सबसे प्रभावशाली आर्थिक सम्मेलनों में से एक—ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम की मेजबानी कर रहा है।
- वैश्विक पहचान: प्रधानमंत्री ने भारत को 'लोकतंत्र की जननी' बताते हुए देश की 100 से अधिक भाषाओं, 80,000 समाचार पत्रों और व्यापक मीडिया स्वतंत्रता को दुनिया के सामने रखा।
- शासन का नया सिद्धांत: 21वीं सदी की शक्ति को आम जनमानस के सशक्तिकरण (पावर टू एम्पॉवर) का साधन बनाने का आह्वान किया गया।
- ठोस आर्थिक आंकड़े: 700 अरब डॉलर पार विदेशी मुद्रा भंडार, सुदृढ़ बैंकिंग व्यवस्था और तीव्र आर्थिक विकास ने भारत को वैश्विक पूंजी के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना बनाया।
- भविष्य की दिशा: तकनीक, एआई, चिप निर्माण और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में भारत ने वैश्विक साझीदारों को मिलकर काम करने का खुला मंच प्रदान किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह संबोधन स्पष्ट संकेत देता है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर केवल एक बड़ा बाजार बनकर नहीं बैठा है, बल्कि वह वैश्विक आर्थिक एजेंडा तय करने, लोकतांत्रिक मूल्यों का नेतृत्व करने और एक बहुध्रुवीय विश्व में स्थिरता का मजबूत स्तंभ बनने की दिशा में आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ा चुका है।