मध्य प्रदेश के राजस्व महकमे में प्रशासनिक हठधर्मिता और मैदानी कर्मचारियों के बीच तनातनी ने एक बड़े गतिरोध का रूप ले लिया है। केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी 'स्वामित्व योजना' के क्रियान्वयन में सुस्ती और कथित लापरवाही का हवाला देते हुए प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया है। गुना जिले में 4 पटवारियों को निलंबित किए जाने और 52 परिवीक्षाधीन (प्रोबेशनर) पटवारियों को सीधे सेवा समाप्ति (टर्मिनेशन) का नोटिस थमाए जाने के बाद पूरे प्रदेश में भूचाल आ गया है। इस दंडात्मक कार्रवाई के विरोध में मध्य प्रदेश पटवारी संघ ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान करते हुए सभी शासकीय ऑनलाइन पोर्टलों का बहिष्कार करने और सरकारी संवाद समूहों से बाहर निकलने का फैसला किया है।

इस फैसले के बाद समूचे मध्य प्रदेश में नामांतरण, सीमांकन, बंटवारा, गिरदावरी और खसरा-खतौनी की नकल जैसी रोज़मर्रा की बुनियादी सेवाएं ठप होने के कगार पर पहुंच गई हैं। आम किसान और नागरिक, जो रोज़ाना अपनी ज़मीनों की पैमाइश या कानूनी औपचारिकताओं के लिए तहसील और पटवारी दफ्तरों के चक्कर काटते हैं, वे अब इस प्रशासनिक टकराव की सीधी मार झेलने को मजबूर हैं।

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विवाद की जड़: क्या है स्वामित्व योजना और क्यों भड़का गतिरोध?

मामले को आसान शब्दों में समझने के लिए रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक उदाहरण लिया जा सकता है। मान लीजिए किसी परिवार में वर्षों से पैतृक मकान है, लेकिन उसके पास मालिकाना हक का कोई पक्का सरकारी दस्तावेज़ नहीं है। सरकार की 'स्वामित्व योजना' का उद्देश्य भी यही है कि ड्रोन तकनीक से गांवों की आबादी भूमि का डिजिटल नक्शा तैयार किया जाए और ग्रामीणों को उनकी रिहायशी संपत्ति का 'अधिकार अभिलेख' यानी प्रॉपर्टी कार्ड (निशुल्क रजिस्ट्री) सौंप दिया जाए।

कागज़ों पर बेहद लोककल्याणकारी दिखने वाली यह योजना ज़मीन पर उतरते ही कानूनी और प्रक्रियात्मक पेंच में फंस गई। विवाद का मुख्य कारण दस्तावेजों के निष्पादन में पटवारियों की भूमिका तय करना बना। योजना के तहत ग्रामीणों को दिए जाने वाले अधिकार पत्रों के पंजीयन में पटवारी को 'निष्पादक' (Executer) के तौर पर अधिकृत किया जाने लगा। पटवारियों का कहना है कि वे केवल भूमि अभिलेख दर्ज करने वाले मैदानी कर्मचारी हैं, संपत्ति के मालिकाना हक के विक्रेता या कानूनी गारंटर नहीं बन सकते।

पटवारियों की मुख्य कानूनी और व्यावहारिक आपत्तियां

  • भविष्य के मुकदमों का जोखिम: ग्रामीण अंचलों में आबादी की ज़मीनों पर वर्षों से पारिवारिक विवाद और साझे की दीवार के झगड़े चलते रहते हैं। यदि पटवारी के हस्ताक्षर से निष्पादन होता है और कल को कोई पक्ष अदालत जाता है, तो सीधे पटवारी पर धोखाधड़ी या गलत रजिस्ट्री का आपराधिक मुकदमा दर्ज होने का खतरा बना रहेगा।
  • सर्वे और सॉफ्टवेयर की विसंगतियां: कई स्थानों पर ड्रोन सर्वे में मकानों की सीमाओं का सटीक मिलान नहीं हो पाया। डिजिटल मानचित्र और धरातल की वास्तविक स्थिति में अंतर होने के कारण विवाद खड़े हो रहे हैं।
  • अत्यधिक कार्यभार और तकनीकी विफलता: राजस्व विभाग के सारा (SAARA) पोर्टल और आरसीएमएस (RCMS) सर्वर की तकनीकी खामियों के बीच सीमित समय में शत-प्रतिशत लक्ष्य हासिल करने का अव्यावहारिक दबाव बनाया गया।
गुना से शुरू हुआ प्रशासनिक बवंडर: 4 सस्पेंड, 52 को नोटिस

इस पूरे विवाद का केंद्र गुना जिला बना, जहां कलेक्टर और वरिष्ठ राजस्व अधिकारियों द्वारा समीक्षा बैठक के दौरान स्वामित्व योजना में अपेक्षित प्रगति न पाए जाने पर सख्त कदम उठाए गए। प्रशासन का मानना था कि निर्देशों के बावजूद कर्मचारी कार्य में हीलाहवाली कर रहे हैं और निर्धारित समयसीमा का उल्लंघन हो रहा है।

प्रशासनिक समीक्षा के उपरांत तत्काल प्रभाव से 4 पटवारियों को दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही बरतने के आरोप में निलंबित कर दिया गया। इसके साथ ही, जिले में नव-नियुक्त 52 परिवीक्षाधीन पटवारियों को सिविल सेवा नियमों के तहत कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए सेवा समाप्ति की चेतावनी दे दी गई। नोटिस में स्पष्ट किया गया कि यदि निर्धारित अवधि में संतोषजनक प्रगति और जवाब नहीं मिला, तो उनकी सेवाएं समाप्त कर दी जाएंगी।

गुना के अलावा देवास, आगर मालवा, ग्वालियर और सतना जिलों में भी ऐसी ही सख्त कार्रवाई की खबरें सामने आईं, जहां कई पटवारियों पर वेतन रोकने, निलंबन और बर्खास्तगी की तलवार लटकाई गई। प्रशासनिक हलकों में इसे अनुशासन कायम करने की कवायद बताया गया, लेकिन कर्मचारी संगठनों ने इसे दमनकारी रवैया करार दिया।

पटवारी संघ का कड़ा रुख: डिजिटल हड़ताल का ऐलान

गुना समेत विभिन्न जिलों में हुई ताबड़तोड़ कार्रवाइयों के बाद मध्य प्रदेश पटवारी संघ लामबंद हो गया। प्रांतीय कार्यकारिणी की आपात बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि यदि प्रशासन अपनी एकतरफा दंडात्मक कार्रवाई वापस नहीं लेता, तो प्रदेश के सभी जिलों में असहयोग आंदोलन छेड़ा जाएगा।

कर्मचारी संघ द्वारा घोषित आंदोलन की मुख्य रूपरेखा

  • ऑनलाइन राजस्व कार्यों का संपूर्ण बहिष्कार: आरसीएमएस (Revenue Case Management System), सारा पोर्टल और एमपी भूलेख जैसे सभी आधिकारिक डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर लॉगिन न करने का फैसला लिया गया।
  • शासकीय व्हाट्सऐप ग्रुप्स से बहिर्गमन: अधिकारियों द्वारा दिए जाने वाले मौखिक और त्वरित आदेशों के दबाव से बचने के लिए पटवारियों ने सभी आधिकारिक व्हाट्सऐप ग्रुप्स छोड़ दिए।
  • निजी संसाधनों के उपयोग पर रोक: पटवारियों ने स्पष्ट किया कि जब शासन उन्हें आवश्यक उपकरण, हाई-स्पीड इंटरनेट और फील्ड में तकनीकी सुरक्षा नहीं दे रहा है, तो वे अपने निजी मोबाइल और लैपटॉप से जोखिम भरे कार्य नहीं करेंगे।
  • निलंबन और नोटिस वापसी की मांग: संगठन ने दो टूक मांग रखी कि गुना के 4 निलंबित पटवारियों को तत्काल बहाल किया जाए और 52 कर्मियों को दिए गए बर्खास्तगी नोटिस निरस्त किए जाएं।
आम जनता और किसानों पर सीधा प्रभाव

राजस्व प्रशासन की रीढ़ पटवारी होते हैं। गांव में ज़मीन की चौहद्दी नापने से लेकर सरकारी मुआवज़ा बांटने तक का हर काम पटवारी की रिपोर्ट पर ही निर्भर करता है। जब यह कड़ी टूटती है, तो इसका सीधा असर आम ग्रामीण की ज़िंदगी पर पड़ता है। जैसे किसी गाड़ी का एक पहिया जाम हो जाने पर पूरी यात्रा रुक जाती है, ठीक वैसे ही पटवारियों के डिजिटल काम बंद करने से पूरी प्रशासनिक मशीनरी चरमरा गई है।

किन-किन कार्यों पर पड़ा है सबसे ज्यादा असर?

  • ज़मीन का नामांतरण और बंटवारा: पैतृक संपत्ति के बंटवारे और ज़मीन की खरीद-बिक्री के बाद नामांतरण की प्रक्रिया ऑनलाइन रुक जाने से हजारों फाइलें लंबित हो गई हैं।
  • सीमांकन और पैमाइश: खरीफ फसलों की कटाई और रबी की बुआई के मौसम में ज़मीनी विवादों के निपटारे के लिए होने वाला सीमांकन कार्य ठप हो गया है।
  • किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) और ऋण: बैंकों से खाद-बीज के लिए ऋण लेने वाले किसानों को खसरा और बी-1 की सत्यापित नकल नहीं मिल पा रही है, जिससे ऋण प्रक्रिया बाधित हो रही है।
  • जाति, आय और मूल निवासी प्रमाण पत्र: छात्रों और युवाओं के आवश्यक प्रमाण पत्रों के लिए पटवारी की मौका-मुआयना जांच रिपोर्ट अनिवार्य होती है, जो अब समय पर नहीं मिल रही है।
प्रशासनिक दृष्टिकोण: समयसीमा और जवाबदेही की दलील

दूसरी तरफ, प्रशासनिक अधिकारियों का पक्ष है कि 'स्वामित्व योजना' केंद्र सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता वाली फ्लैगशिप योजना है। इस योजना का सीधा उद्देश्य ग्रामीण भारत को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और उन्हें अपनी संपत्ति के आधार पर बैंक लोन की सुविधा उपलब्ध कराना है।

वरिष्ठ अधिकारियों का तर्क है कि शासन स्तर से बार-बार प्रशिक्षण और दिशा-निर्देश जारी किए जाने के बाद भी मैदानी स्तर पर शिथिलता बरती जा रही थी। प्रशासनिक व्यवस्था में यदि योजनाओं को समयबद्ध ढंग से पूरा नहीं किया जाएगा, तो जनता तक उनके लाभ नहीं पहुंच सकेंगे। अधिकारियों के अनुसार, परिवीक्षाधीन अवधि में कार्यकुशलता और अनुशासन का परीक्षण अनिवार्य होता है, और नोटिस जारी करना सेवा शर्तों का वैधानिक हिस्सा है।

समाधान की दिशा: संवाद से ही संभव है गतिरोध का अंत

विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे गतिरोध का समाधान न तो केवल सख्त दंडात्मक कार्रवाइयों से निकल सकता है और न ही काम ठप करने से। ज़मीनी हकीकत यह है कि राजस्व कानून बेहद जटिल हैं और किसी भी कर्मचारी पर ऐसा दायित्व नहीं थोपा जाना चाहिए जो उसे भविष्य में न्यायिक उलझनों में डाल दे।

प्रशासन को चाहिए कि वह स्वामित्व योजना में 'निष्पादक' की भूमिका को लेकर विधि विशेषज्ञों से परामर्श करे और पटवारियों को कानूनी संरक्षण का भरोसा दे। वहीं, पटवारी संघ को भी जनहित को ध्यान में रखते हुए मध्यस्थता और बातचीत के जरिए समाधान तलाशना चाहिए, ताकि शासन की महत्वाकांक्षी योजना भी पूरी हो सके और आम नागरिकों को भी राजस्व दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें।