मध्य प्रदेश के वनों से भारतीय वन्यजीव संरक्षण के इतिहास की सबसे प्रेरणादायक और सुखद खबर सामने आई है। राज्य का गौरव और राजकीय पशु 'हार्ड ग्राउंड बारहसिंगा' (ब्रैंडरी बारहसिंगा) जिसे आधी सदी पहले प्रकृति के मंच से हमेशा के लिए विदा मान लिया गया था, उसने अपनी जीवटता और वन विभाग के अथक प्रयासों के दम पर शानदार वापसी की है। 1970 के दशक में जब पूरे संसार में इनकी संख्या घटकर महज 66 रह गई थी, तब इनके अस्तित्व पर गंभीर संकट मंडरा रहा था। आज वही आंकड़ा मध्य प्रदेश के जंगलों में छलांग लगाते हुए लगभग 1300 के पार पहुंच चुका है। कान्हा टाइगर रिजर्व की हरी-भरी वादियों से शुरू हुआ यह पुनर्जीवन अभियान अब सतपुड़ा टाइगर रिजर्व की विंध्य-सतपुड़ा उपत्यकाओं में भी पूरी भव्यता के साथ लहलहा रहा है।
आम बोलचाल में समझें तो यह सफलता बिल्कुल वैसी ही है, जैसे किसी परिवार की पूरी जमा-पूंजी आग में जलने के बाद केवल एक छोटी सी बची हुई पूंजी से कोई परिश्रमी मुखिया फिर से एक विशाल और खुशहाल साम्राज्य खड़ा कर दे। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, यदि समय रहते कान्हा में कड़े कदम न उठाए गए होते और बाद में सतपुड़ा में इनके सफल पुनर्वास की दूरदर्शी रणनीति न अपनाई गई होती, तो शायद आज हम इस खूबसूरत वन्यजीव को केवल तस्वीरों या किताबों के पन्नों में ही देख पाते।
हार्ड ग्राउंड बारहसिंगा (Rucervus duvaucelii branderi) मध्य भारत के खुले घास के मैदानों और साल वनों का मूल निवासी है। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में अत्यधिक शिकार, खेती के लिए जंगलों की कटाई और मवेशियों की अनियंत्रित चराई के चलते इनके प्राकृतिक आवास नष्ट हो गए थे। स्थिति इतनी भयावह हो गई थी कि 1960 के दशक के उत्तरार्ध में यह प्रजाति लगभग लुप्तप्राय घोषित होने की कगार पर पहुंच गई थी।
कान्हा और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के आधिकारिक दस्तावेजों तथा भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के अनुसार बारहसिंगा की संख्या में आए उतार-चढ़ाव का ब्योरा इस प्रकार है:
- 1938 का दौर: मध्य भारत के जंगलों में इनकी अनुमानित संख्या लगभग 3,000 से अधिक दर्ज थी।
- 1970 का संकटकाल: मानवीय दखल, शिकार और संक्रामक बीमारियों के चलते कान्हा नेशनल पार्क में केवल 66 बारहसिंगा ही जीवित बचे।
- 1980 से 1990 का दशक: कान्हा में विशेष बाड़े (एन्क्लोजर) बनाकर शिकारियों से सुरक्षा दी गई, जिससे संख्या बढ़कर 400 से 500 के बीच पहुंची।
- 2015 का ऐतिहासिक निर्णय: जैव विविधता के सिद्धांत 'सभी अंडे एक ही टोकरी में न रखने' के तहत कान्हा से सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में बारहसिंगा का ट्रांसलोकेशन शुरू किया गया।
- 2026 की वर्तमान स्थिति: कान्हा टाइगर रिजर्व में इनकी तादाद 950 से 1000 के करीब है, जबकि सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में यह कुनबा 300 के पार (लगभग 303 से अधिक) पहुंच चुका है। इसके अलावा भोपाल के वन विहार और बांधवगढ़ में भी इनकी मौजूदगी दर्ज है, जिससे कुल संख्या 1300 के मुहाने पर खड़ी है।
बारहसिंगा शब्द सुनते ही आमतौर पर लोगों के जेहन में तराई या दलदल के पानी में तैरने वाले हिरण की छवि उभरती है, लेकिन मध्य प्रदेश का यह बारहसिंगा अपनी प्रजाति में बेहद अनोखा है। भारत में बारहसिंगा की तीन प्रमुख उप-प्रजातियां पाई जाती हैं:
- उत्तरी बारहसिंगा: यह गंगा और यमुना के मैदानी इलाकों व दुधवा नेशनल पार्क के दलदलों में पाया जाता है।
- पूर्वी बारहसिंगा: यह असम के काजीरंगा नेशनल पार्क और ब्रह्मपुत्र घाटी के आर्द्र क्षेत्रों में निवास करता है।
- हार्ड ग्राउंड (ब्रैंडरी) बारहसिंगा: यह केवल मध्य भारत के सूखे और सख्त पठारी घास के मैदानों के अनुकूल ढला हुआ जीव है। इसके खुर (hooves) सख्त होते हैं, जो इसे पथरीली और सूखी जमीन पर तेज गति से दौड़ने में सक्षम बनाते हैं।
नर बारहसिंगा के सींगों में शाखाएं निकलती हैं, जो विकसित होकर 10 से 14 शाखाओं तक पहुंच जाती हैं, इसीलिए इसे बारहसिंगा कहा जाता है। साल 2017 में कान्हा टाइगर रिजर्व भारत का पहला ऐसा राष्ट्रीय उद्यान बना जिसने एक वन्यजीव को अपना आधिकारिक शुभंकर (मैस्कॉट) घोषित किया। प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट रोहन चक्रवर्ती द्वारा डिजाइन किया गया 'भूरसिंह द बारहसिंगा' आज पूरे देश में प्रकृति प्रेमियों के बीच पर्यावरण संरक्षण का वैश्विक प्रतीक बन चुका है।
कान्हा से सतपुड़ा का सफर: 'एक ही टोकरी में सारे अंडे न रखने' की दूरदर्शी नीतिजब कान्हा में बारहसिंगा की संख्या 700 से 800 के पार पहुंच गई, तब वन्यजीव वैज्ञानिकों और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के सामने एक गंभीर चिंता पैदा हुई। प्रकृति में यदि किसी संकटग्रस्त प्रजाति की पूरी आबादी केवल एक ही जंगल में सीमित रहे, तो किसी एक महामारी (जैसे खुरपका-मुंहपका या एंथ्रेक्स), भीषण दावानल या प्राकृतिक आपदा से पूरी नस्ल एक झटके में हमेशा के लिए खत्म हो सकती है। इसे वैज्ञानिक भाषा में 'डेमोग्राफिक रिस्क' कहा जाता है।
इसी जोखिम को टालने के लिए मध्य प्रदेश वन विभाग ने सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को बारहसिंगा का दूसरा घर बनाने की योजना तैयार की। सतपुड़ा की आबोहवा, बोरी अभयारण्य का खुला इलाका और चूरना की घाटियां बारहसिंगा के आवास के लिए सर्वथा अनुकूल पाई गईं।
बोमा तकनीक से हुआ था ऐतिहासिक ट्रांसलोकेशन
हिरण प्रजाति के जीव स्वभाव से अत्यंत संवेदनशील और नाजुक होते हैं। इन्हें पकड़ने के लिए सामान्य बेहोशी के इंजेक्शन (ट्रैंक्विलाइजर) का अत्यधिक इस्तेमाल खतरनाक साबित हो सकता है क्योंकि अचानक घबराहट से इनके दिल की धड़कन रुकने (कैप्चर मायोपैथी) का खतरा रहता है। इसके समाधान के लिए अफ्रीका की प्रसिद्ध 'बोमा तकनीक' (फनल के आकार का बाड़ा) का उपयोग किया गया।
वर्ष 2015 में विशेष रूप से तैयार किए गए ट्रकों में बेहद सावधानी के साथ कान्हा से सतपुड़ा तक बारहसिंगा के पहले जत्थे को पहुंचाया गया। शुरुआत में इन्हें सतपुड़ा के सुरक्षित और शिकारियों से मुक्त बड़े बाड़ों में रखा गया। जब ये नए माहौल में पूरी तरह रच-बस गए और इन्होंने प्राकृतिक रूप से प्रजनन करना शुरू कर दिया, तब इन्हें चरणबद्ध तरीके से खुले जंगलों में छोड़ दिया गया। मात्र एक दशक के भीतर सतपुड़ा में इनकी संख्या शून्य से बढ़कर 300 के पार पहुंच जाना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि यह पुनर्वास अभियान भारत के सबसे सफल वन्यजीव प्रयोगों में शामिल हो चुका है।
सतपुड़ा में घास के मैदानों और प्राकृतिक कॉरिडोर का विस्तारसतपुड़ा टाइगर रिजर्व में बारहसिंगा की बढ़ती संख्या को देखते हुए वन प्रबंधन अब इनके लिए सुरक्षित आवागमन और भोजन की स्थायी व्यवस्था में जुटा है। जैसे किसी बढ़ते हुए शहर में नई रिहायशी कॉलोनियों के बीच चौड़ी सड़कें और सुविधाएं जोड़ी जाती हैं, वैसे ही सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच अलग-अलग घास के मैदानों (ग्रासलैंड्स) को आपस में जोड़ने के लिए विशेष कॉरिडोर बनाए जा रहे हैं।
घास के मैदानों का वैज्ञानिक प्रबंधन
- पसंदीदा घासों की बुआई: बारहसिंगा मुख्य रूप से विशेष पोषक तत्वों से भरपूर मुलायम घासों (जैसे थीमेडा, सैकर्म और डिगेंथेरियम) पर निर्भर रहता है। वन विभाग इन घासों के प्राकृतिक फैलाव को प्राथमिकता दे रहा है।
- गाजरघास और लेंटाना का खात्मा: बारहसिंगा के भोजन को बर्बाद करने वाली आक्रामक विदेशी वनस्पतियों जैसे लेंटाना कमारा और पार्थेनियम (गाजरघास) को बड़े पैमाने पर उखाड़कर जमीन को उपजाऊ चारागाह बनाया जा रहा है।
- गांवों का स्वैच्छिक पुनर्वास: सतपुड़ा के कोर एरिया से कई वन ग्रामों का आपसी सहमति से सम्मानजनक पुनर्वास किया गया है। खाली हुई उन भूमियों को अब लहलहाते चारागाहों में तब्दील कर दिया गया है, जहां बारहसिंगा के झुंड निडर होकर कुलांचे भरते दिखाई देते हैं।
मध्य प्रदेश में बारहसिंगा की इस ऐतिहासिक वापसी का श्रेय केवल कागजी योजनाओं को नहीं, बल्कि जमीन पर मुस्तैदी से काम करने वाले वनकर्मियों और आधुनिक विज्ञान के तालमेल को जाता है। यह सफलता पांच मजबूत स्तंभों पर टिकी है:
- 1. शिकार पर शून्य सहनशीलता: वन क्षेत्रों में 24 घंटे गश्त, आधुनिक ड्रोन निगरानी और शिकारियों के पुराने रास्तों पर खुफिया तंत्र की तैनाती से अवैध शिकार पर पूरी तरह लगाम कसी गई।
- 2. शिकारियों से प्रारंभिक सुरक्षा (प्रिडेटर-प्रूफ बाड़े): शुरुआती वर्षों में नवजात शावकों को तेंदुओं, बाघों और आवारा कुत्तों से बचाने के लिए सोलर फेंसिंग वाले बाड़ों में सुरक्षित माहौल प्रदान किया गया।
- 3. आनुवंशिक विविधता (जेनेटिक डायवर्सिटी): एक ही कुनबे में लगातार प्रजनन से होने वाली जन्मजात कमजोरियों को रोकने के लिए अलग-अलग समूहों के बारहसिंगा का वैज्ञानिक आदान-प्रदान किया गया।
- 4. पेयजल और वेटलैंड्स का विकास: गर्मी के मौसम में पानी की तलाश में बारहसिंगा को भटकना न पड़े, इसके लिए कृत्रिम जल स्रोतों और सोलर पंप बोरवेल्स की व्यवस्था की गई।
- 5. स्थानीय जनजातियों का सहयोग: कान्हा और सतपुड़ा के आसपास रहने वाले बैगा और गोंड समुदाय के युवाओं को 'वन रक्षक' और गाइड के रूप में जोड़ा गया, जिनकी पारंपरिक समझ ने बारहसिंगा की सुरक्षा को अभेद्य बना दिया।
बारहसिंगा का बढ़ना केवल एक प्रजाति की संख्या का बढ़ना नहीं है, बल्कि यह पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के स्वस्थ होने का सबसे बड़ा थर्मामीटर है। शाकाहारी जीवों की प्रचुरता से जंगल में बाघ, तेंदुए और अन्य मांसाहारी जीवों के लिए प्राकृतिक शिकार का संतुलन बना रहता है, जिससे इंसानी बस्तियों की ओर वन्यजीवों का रुख कम होता है और मानव-वन्यजीव संघर्ष में भारी कमी आती है।
इसके अलावा, कान्हा और सतपुड़ा में बारहसिंगा की मौजूदगी ने देश-विदेश के पर्यटकों और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफरों को जबरदस्त तरीके से आकर्षित किया है। कान्हा में सुबह के कोहरे के बीच सींगों पर घास लपेटे बारहसिंगा को देखना और सतपुड़ा के खुले मैदानों में इनके झुंड का दीदार करना पर्यटकों के लिए जीवन का अविस्मरणीय अनुभव बन चुका है। इससे स्थानीय होटल उद्योग, जिप्सी चालकों और ग्रामीण होम-स्टे को आर्थिक मजबूती मिल रही है।
आगे की राह: बांधवगढ़ और अन्य अभयारण्यों में भी गूंजेगी बारहसिंगा की पदचापकान्हा और सतपुड़ा की इस शानदार कामयाबी से उत्साहित मध्य प्रदेश वन विभाग अब बारहसिंगा को राज्य के अन्य ऐतिहासिक जंगलों में भी फिर से स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व और नौरादेही (वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व) के कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में भी वातावरण का आकलन किया जा रहा है, ताकि भविष्य में इस दुर्लभ प्रजाति के कई सुरक्षित ठिकाने तैयार हो सकें।
मध्य प्रदेश की यह कहानी पूरी दुनिया को यह गहरा संदेश देती है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, वन कर्मियों का निस्वार्थ समर्पण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण एक साथ मिल जाएं, तो मौत के मुंह में जा चुकी किसी भी प्रजाति को जीवन का नया सवेरा दिया जा सकता है। 66 से 1300 तक का यह सफर केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं, बल्कि कुदरत के साथ इंसान के सुधरते रिश्तों की अमर इबारत है।