बेंगलुरु: स्मार्टफोन और लैपटॉप से लेकर इलेक्ट्रिक कार, फाइटर जेट और मेडिकल इक्विपमेंट तक—हर आधुनिक उपकरण का हृदय सिलिकॉन से बनी एक नन्हीं सेमीकंडक्टर चिप होती है। वैश्विक स्तर पर उपजे भू-राजनीतिक तनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चिप निर्माण पर किसी एक देश या क्षेत्र का एकाधिकार दुनिया के लिए जोखिम भरा है।
भारत सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) की रणनीतिक अहमियत
भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन ₹76,000 करोड़ के प्रोत्साहन पैकेज के साथ देश को सिलिकॉन विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में अग्रसर है। गुजरात के धोलेरा और साणंद सहित असम के जागीरोड में स्वीकृत फैब और ओएसएटी (OSAT) इकाइयां इस क्रांति की नींव हैं।
चिप निर्माण की जटिलताएं और चुनौतियां
- अल्ट्रा-प्योर वातावरण (Cleanrooms): चिप निर्माण के लिए क्लास-1 स्तर के स्वच्छ कमरों की आवश्यकता होती है, जहां धूल का एक कण भी सिलिकॉन वेफर को नष्ट कर सकता है।
- विशाल जल एवं बिजली आपूर्ति: एक आधुनिक फैब प्लांट को प्रतिदिन लाखों गैलन अल्ट्रा-प्योर पानी और 24 घंटे निर्बाध उच्च-वोल्टेज बिजली चाहिए।
- कौशल विकास: वैश्विक मानकों के सेमीकंडक्टर इंजीनियरों और तकनीशियनों की भारी मांग को पूरा करने के लिए आईआईटी और एनआईटी में विशेष पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं।
भारत के पास पहले से ही दुनिया के 20% से अधिक चिप डिजाइन इंजीनियर मौजूद हैं। विनिर्माण क्षमता विकसित होने से भारत दुनिया के चिप सप्लाई संकट का स्थायी समाधान बन सकता है।