नई दिल्ली: डिजिटल अर्थव्यवस्था के तेजी से बढ़ते दायरे के बीच भारतीय नागरिकों की निजता और डिजिटल अधिकारों की सुरक्षा के लिए संसद द्वारा पारित डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम एक मील का पत्थर है। यह कानून प्रत्येक नागरिक को उसके डेटा का वास्तविक स्वामी बनाता है।

डेटा प्रिंसिपल और डेटा फिड्यूशरी की अवधारणा

कानून के तहत आम नागरिक को "डेटा प्रिंसिपल" (Data Principal) कहा गया है, जबकि नागरिकों का डेटा एकत्र करने वाली कंपनियों, बैंकों और ऐप्स को "डेटा फिड्यूशरी" (Data Fiduciary) का दर्जा दिया गया है। कंपनियों को अब स्पष्ट, सरल और बहुभाषी सहमति पत्र (Consent Notice) दिखाना अनिवार्य है।

नागरिकों को मिले प्रमुख अधिकार

  • डेटा तक पहुंच का अधिकार: उपयोगकर्ता यह जान सकते हैं कि कंपनी के पास उनकी कौन-सी जानकारी है और उसे किसके साथ साझा किया गया है।
  • सुधार एवं विलोपन (Right to Erasure): यदि आप किसी सेवा का उपयोग बंद करते हैं, तो आप कंपनी से अपना डेटा पूरी तरह मिटाने का अनुरोध कर सकते हैं।
  • शिकायत निवारण: डेटा सुरक्षा बोर्ड (Data Protection Board) के माध्यम से किसी भी अनुचित डेटा उपयोग की त्वरित शिकायत और निवारण की सुविधा।

डेटा ब्रीच होने की स्थिति में कंपनियों पर ₹250 करोड़ तक के दंडात्मक प्रावधान किए गए हैं, जिससे तकनीकी कंपनियों में डेटा सुरक्षा के प्रति गंभीरता बढ़ी है।