बेंगलुरु: सैन फ्रांसिस्को और बीजिंग जैसे शहरों में बिना ड्राइवर वाली रोबोटैक्सी (Robotaxi) सड़कों पर आम हो चुकी हैं। वेमो और बायडू जैसी कंपनियां लाखों किलोमीटर का ऑटोनॉमस सफर बिना मानवीय हस्तक्षेप के पूरा कर चुकी हैं। लेकिन क्या यह तकनीक भारत की जीवंत और जटिल सड़कों पर कभी काम कर पाएगी?
सेल्फ-ड्राइविंग कारों की सेंसिंग आंखें
- लिडार (LiDAR): लेजर किरणों की मदद से गाड़ी के चारों ओर का 3D रीयल-टाइम मैप तैयार करना।
- कंप्यूटर विजन और कैमरे: ट्रैफिक सिग्नल, पैदल यात्रियों, लेन मार्किंग और सड़क संकेतों को पहचानना।
- राडार और अल्ट्रासोनिक सेंसर: कोहरे, भारी बारिश या धूल भरी आंधी में अन्य वाहनों की दूरी और गति का सटीक आकलन।
भारतीय परिस्थितियों की अनूठी चुनौतियां
पश्चिमी देशों में सड़कें लेन मार्किंग और सख्त ट्रैफिक नियमों के अनुसार चलती हैं। इसके विपरीत भारतीय सड़कों पर अचानक आने वाले मवेशी, बेतरतीब दोपहिया वाहन, सड़क पर बिना चेतावनी के बने गड्ढे और लेन अनुशासन का अभाव दुनिया के सबसे उन्नत एआई मॉडल्स के लिए भी एक भयानक चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
भारतीय शोधकर्ता मानते हैं कि पूर्ण ऑटोनॉमस (Level-5) के बजाय भारत में एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS Level-2)—जैसे ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग, लेन कीप असिस्ट और ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग—सड़क दुर्घटनाओं को कम करने में अधिक व्यावहारिक और जीवन-रक्षक सिद्ध हो रहे हैं।